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Saturday, 7 March 2015

आपका बंटी (मन्नू भंडारी)

आपका बंटी
मन्नू भंडारी

“ एक कमरे में सारा सामान अस्त व्यस्त ढंग से पड़ा है- बंटी के घर का सामान ! बक्से-बिस्तरे, गठरी में बंधी हुई किताबें... टोकरी में भरे हुए बंटी के खिलौने ... बंटी की पेंटिंग्स... और भी जाने क्या-क्या ! लगा जैसे उसका सारा घर गठरियों, टोकरियों में बांधकर यहाँ ठूंस दिया गया है. मम्मी एक बक्से में से कपड़े निकाल रही हैं और बंटी उस सामान को देख रहा है. सामान का भी चेहरा होता है क्या ? सारा सामान कैसा उदास-उदास लग रहा है . “

बंटी के पिता (अजय) और उसकी मम्मी में सम्बन्ध विच्छेद हो गया है और तलाक की औपचारिकता अपनी प्रक्रियाओं से गुज़र रही है.
और साथ में बंटी और उसकी मम्मी की ज़िन्दगी भी गुज़र रही है.
मम्मी का एक नाम तो है (शकुन) पर वो इंसान इस कहानी में, शकुन की ज़िन्दगी और मम्मी की ज़िन्दगी के बीच झूल रही हैं.
कभी मम्मी का व्यक्तित्व और सोच शकुन पर हावी हो जाते हैं कभी शकुन पर मम्मी का व्यक्तित्व और सोच हावी हो जाता है.
इस द्वंध को बंटी देख रहा है, उसके नतीजे भुगत रहा है और अपनी अक्ल के हिसाब से समझने की कोशिश भी कर रहा है.
“पर बंटी को ये नहीं समझ आता कि क्यों वो जब किसी से अपने पापा की बात करना चाहता है तो पूरा माहौल उदास हो जाता है, और उसे ये एहसास होता कि उसने शायद कोई गलती कर दी है . आखिर वो अपने पापा की बात आराम से किससे करे ?”
और जब क्लास में रामायण और महाभारत कि लड़ाइयों की कहानी वो समझ सकता है तो क्यों उसे नासमझ समझकर अपने मम्मी पापा कि लड़ाई की बात नहीं समझाई जाती ?
और जब चाचा ने उसकी बनाई हुई पेंटिंग्स देखकर पूछा
“ये चित्र तुमने बनाए हैं ?
‘हां’ बड़े गर्व से बंटी ने कहा “स्कूल में मेरी और भी अच्छी-अच्छी पेंटिंग्स रखी हैं. आर्ट क्लब का चीफ हूँ...”
“अच्छा” चाचा ने शाबाशी देते हुए उसकी पीठ थपथपाई और फिर जैसे कहीं से उदास हो गए.
पर यह भी कोई उदास होने कि बात हुई भला !”
इस उपन्यास को शकुन और बंटी के अंतर्मन की बातें, पाठक के बिलकुल करीब लेकर जाती हैं.
पात्रों की परिस्थितियां भले ही पाठकों की जिंदगी से अलग हों पर जो द्वंद्ध शकुन के मन में है, अपने रिश्तों को और खुद को लेकर, जिस दुविधा में वो है, वो अंतर्द्वंध और दुविधा हम सब की जिंदगी का एक अभिन्न अंग है.
बंटी के मन की बातें बताती हैं कि बच्चों के सवाल, उनकी बातें अक्सर बेवजह नहीं होती. कुछ वजह जरुर होती है और उस वजह को जानने कि कोशिश करना जरुरी है. बंटी के मन की बातें पाठकों को अपने बच्चों के करीब ले जाने में, उन्हें समझने में मदद  करती हैं.(मन्नू जी को लिखे गए पाठकों के कई पत्र इस बात की पुष्टि करते हैं )  
एक अच्छी कहानी एक महान उपन्यास तब कहलाती है जब वो कहानी, आपकी जिंदगी को बेहतर बनाने का एक माध्यम साबित हो, उस कहानी के माध्यम से कई ऐसी बातें समझ में आयें जो आजतक समझ में न आई हों या जब उसे पढ़कर पाठक खुद अपनी जिंदगी को बदलने के लिए प्रयास करे.
“आपका बंटी” एक ऐसी ही कहानी है.

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