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Thursday, 22 August 2013

बाबुल तुम बगिया के तरुवर (गोपाल सिंह नेपाली)


बाबुल तुम बगिया के तरुवर
गोपाल सिंह नेपाली

बाबुल तुम बगिया के तरुवर, हम तरुवर की चिड़िया रे
दाना चुगते उड़ जाएँ हम, पिया मिलन की घड़ियाँ रे
उड़ जाएँ तो लौट ना आयें, ज्यों मोती की लडियां रे
बाबुल तुम बगिया के तरुवर ....


आँखों से आँसू  निकले तो पीछे तके नहीं मुड़के
घर की कन्या वन का पंछी, फिर न डाली से उड़के
बाजी हारी हुई त्रिया की
जनम- जनम सौगात पिया की
 बाबुल तुम गूंगे नैना, हम आँसू की फुलझड़ीयाँ  रे
उड़ जाएँ तो लौट ना आयें, ज्यों मोती की लड़ियाँ   रे


हमको सुध न जनम के पहले, अपनी कहाँ अटारी थी
आँख खुली तो नभ के नीचे, हम थे गोद तुम्हारी थी
ऐसा था वह रैन बसेरा, 
जहाँ साँझ भी लगे सवेरा
बाबुल तुम गिरिराज हिमालय, हम झरनों की कड़ियाँ रे
उड़ जाएँ तो लौट ना आयें, ज्यों मोती की लड़ियाँ   रे

छितराए नौ लाख सितारे , तेरी नभ की छाया में
मंदिर-मूरत, तीरथ देखे, हमने तेरी काया में
दुःख में भी हमने सुख देखा
तुमने बस कन्या मुख देखा
बाबुल तुम कुलवंश कमल हो, हम कोमल पंखुड़ियां रे
उड़ जाएँ तो लौट ना आयें, ज्यों मोती की लड़ियाँ   रे


बचपन के भोलेपन पर जब, छिटके रंग जवानी के
प्यास प्रीती की जागी तो हम, मीन बने बिन पानी के
जनम-जनम के प्यारे नैना
चाहें नहीं कुंवारे रहना
बाबुल ढूंढ  फिरो तुम हमको, हम ढूंढें बाँवरिया रे
उड़ जाएँ तो लौट ना आयें, ज्यों मोती की लड़ियाँ   रे


चढ़ती उम्र बढ़ी तो कुल, मर्यादा से जा टकराई
पगड़ी गिरने के डर से, दुनिया जा डोली ले आई
मन रोया, गूंजी शहनाई
नयन बहें, चुनरी पहनाई
पहनाई चूड़ी सुहाग की, या डाली हथकड़ियां रे
उड़ जाएँ तो लौट ना आयें, ज्यों मोती की लड़ियाँ   रे


मंत्र पढ़े सौ सदी पुराने, रीत निभाई प्रीत नहीं
तन का सौदा करके भी तो, पाया मन का मीत नहीं
गात, फूल सा कांटे पग में
जग के लिए हम जग में
बाबुल तुम पगड़ी समाज के, हम पथ की कंकड़ीयां  रे
उड़ जाएँ तो लौट ना आयें, ज्यों मोती की लड़ियाँ   रे


मांग रची आंसूं के ऊपर, घूँघट गीली आंखों पर
ब्याह नाम से, यह लीला, जाहिर करवाई लाखों पर
जो घूँघट से डर-डर झांके
वरा उसे बाजे बजवा के
गुड़िया  खेल बढे हम, फिर भी दुनिया समझे गुड़िया रे
उड़ जाएँ तो लौट ना आयें, ज्यों मोती की लड़ियाँ   रे


नेह लगा तो नैहर छूटा, पिया मिले बिछुड़ी  सखियाँ
प्यार बताकर पीर मिली तो नीर बनी फूटी  अंखियाँ
हुई चलाकर चाल पुरानी
नई  जवानी पानी-पानी
चली मनाने चिर वसंत में, ज्यों सावन की झड़ियां रे
उड़ जाएँ तो लौट ना आयें, ज्यों मोती की लड़ियाँ   रे


देखा जो ससुराल पहुंचकर, तो दुनिया ही न्यारी थी
फूलों का था देश हरा, पर काँटों की फुलवारी थी
कहने को  सारे अपने थे
पर दिन दोपहर के सपने थे
मिली नाम पर कोमलता के, केवल नरम कंकड़ीयां रे
उड़ जाएँ तो लौट ना आयें, ज्यों मोती की लड़ियाँ   रे


वेद-शास्त्र थे लिखे पुरुष के, मुश्किल था बचकर जाना
हारा दांव बचा लेने को, पति को परमेश्वर जाना
दुल्हन बनकर दिया जलाया
दासी बनकर घर बार चलाया
माँ बनकर ममता बांटी तो, महल बनी झोपड़ियाँ रे
उड़ जाएँ तो लौट ना आयें, ज्यों मोती की लड़ियाँ   रे


मन की सेज सुला प्रियतम को, दीप नयन का मन्द किया
छुड़ा जगत से अपने को, सिंदूर बिंदु में बंद किया
जंजीरों से बाँधा  तन को 
त्याग-राग से साधा मन को
पंछी के उड़ जाने पर ही, खोली नयन किवाड़ीयां रे
उड़ जाएँ तो लौट ना आयें, ज्यों मोती की लड़ियाँ   रे


जनम लिया  तो जले पिता-माँ, यौवन खिला ननद-भाभी
ब्याह रच तो जला मोहल्ला, पुत्र हुआ तो बन्ध्य भी
जले ह्रदय के अन्दर नारी
उस पर बाहर दुनिया सारी
मर जाने पर भी मरघट में, जल-जल उठी लकड़ियाँ रे
उड़ जाएँ तो लौट ना आयें, ज्यों मोती की लड़ियाँ   रे


जनम-जनम जग के नखरे पर, सज-धज कर जाएँ वारी
फिर भी समझ गए रात दिन हम ताड़न के अधिकारी
पहले गए पिया जो हम से
अधम बने हम यहाँ अधम से
पहले ही हम चल बसें, तो जग बांटे रेवड़ियाँ रे

उड़ जाएँ तो लौट ना आयें, ज्यों मोती की लड़ियाँ   रे

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